कलम उठाई ही थी के लिख दू तुझे बिन तेरे भी खरियत है.

कम्ब्कत आँख छलक आई, ये असल तेरी इनायत है.

सितमगर तो तू था, मगर संग ऐ दिल था,

तेरी तस्वीर लिये बैठे हैं, उसे भी सितम ढाने की इजाजत है.

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1 Comment

balveer · April 12, 2018 at 3:07 pm

very good

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