सब कुछ खो के, हम ही गुनाहगार हो गये|

तेरी खातिर अ बेहया, रुसवा सरे बाज़ार हो गये||

कुसूर था क्या मेरा, मिली किस खता की ये सजा|

नैनो के मोती बिखेर दिये, क्यू ना आई तुझे लज्जा||

सब खाख मेरा हुआ, और दुश्मन भी हजार हो गये|

सब कुछ खो के………………………………….

अगर भाप जाते तेरा इरादा, कभी होते ना तेरे रूबरू|

इतने दिये घाव तूने, अब कोन कोन से जख्म भरू|

ये कैसा इश्क था के, मेरे रकीब तेरे संसार हो गये|

सब कुछ खो के…………………………………..

मालूम था मुरझायेगे, जिन फूलो की खातिर गुलिस्ता उजाड़ा था|

फिर किया क्यू तूने इतना बड़ा फरेब, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था||

एक पल की ना ख़ुशी, जीवन में गम बेसुमार हो गये|

सब कुछ खो के……………………………………….

अब बस बहुत हुआ बर्दास्त मुझे, थी एक मुस्कान की चाहत मुझे|

चला मैं तेरी महफ़िल से दूर, और ना चाहिए तेरी झूठी इनायत मुझे||

आज तेरे मुह से निकले हर अल्फाज, भाले और तलवार हो गये|

सब कुछ खो के……………………………….

 

 

 

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1 Comment

anan · March 23, 2018 at 4:47 pm

बहुत खूब लिखा है

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