ख्वाब सजाये थे आँखों में संग यार के।

आधे अधूरे सपने देखे बहुत प्यार के। ।

खुद को बदल लिया, मगर तक़दीर बदल ना सके।

यार को चाहा दिल ओ जां से, मगर हम ना भा सके।

पास हो के भी बहुत फासले नज़र आने लगे।

प्यार के बदले प्यार चाहा मगर प्यार ना पा सके।

कब खत्म होगी दूरिया, कितने पल हैं वो इंतजार के।

आधे अधूरे सपने ……………

आरजू तो ये थी, संग जीना संग मरना है।

उसकी बेरुखी के बाद भी प्यार बहुत करना है।

जो भी उसके दिल में, हर अरमान पूरा करना है,

उसके बिना क्या ज़िंदगी , फिर तो मुझे मरना है।

वक़्त तो ना बदला, मगर बदल गए दिन बहार के।

आधे अधूरे सपने ……………


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