बदनसीबी का साया संग, और कोई ना अपना है। 

तन्हा अकेली ज़िंदगी, अधूरा देखा हर सपना है।।

 

टूट गई उम्मीदें, वो बिखर गये सपने। 

बंजर हुआ गुलशन, रूठे जब अपने।।  

कलम तो रही पर इसमें स्याही नहीं। 

समझाऊ कैसे बिन स्याही लिखे नगमे।। 

कागज़ चीख के कहता रहा, स्याही से सजना है। 

बदनसीबी का साया संग, और कोई ना अपना है। 

 

बेजुबां कागज़ सूना सका ना अपनी कहानी। 

बहरी थी कायनात, समझ सकी ना बेजुबानी। 

जब समझा जमाने ने, ना शेष रही निशानी। 

कहीं दूर, बहुत दूर जा चुकी थी ज़िंदगानी। 

समझ आ गई उसे, पवन संग संग बहना है। 

बदनसीबी का साया संग, और कोई ना अपना है। 

 

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