कौन कहता है के चैन ओ सुकूं बिकता है बाजार में। 

गर ऐसा होता  तो कहाँ खरीददार कम थे संसार में।। 

कौन कहता है के…………………………………।

 

जिसको देखो वो प्यासा, सुकूं के लिए बेक़रार बहुत,

बर्दाश्त कहाँ गम ऐ ज़िंदगी, कर चुके इन्तजार बहुत। 

तलाश के भी तलाश सके ना कहीं चैन ओ करार,

जबकि हर गली हर शहर में गमो के बाजार बहुत।।

कोई ख़ुशी तो ना मिली, बदनाम हो गये बेकार में।  

गर ऐसा होता  तो कहाँ खरीददार कम थे संसार में।। 

कौन कहता है के………………………………..।

 

बिच समुन्द्र थी कश्ती, तरसते रहे एक बून्द पानी को,

बह गई बिच मझधार, बचा ना पाये ज़िंदगानी को। 

कहने को तो डूबते को तिनके का सहारा बहुत है,

मगर दलदल था गम ऐ सितम, डुबोते गये जवानी को। 

सोचा कोई तो आएगा, मगर तमाम उम्र कट गई इंतजार में। 

गर ऐसा होता  तो कहाँ खरीददार कम थे संसार में।। 

कौन कहता है के………………………………।


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