सैर गगन की चाह बहुत, पंख कटा परिंदा हु। 

वफ़ा से वफ़ा ना हो सकी, के मैं शर्विन्दा हु।। 

सैर गगन की चाह बहुत……………………। 

उड़ने की आरजू थी, मन की मन में रह गई,

सपनों की बनाई ईमारत, पल भर में ढह गई। 

अरमान रहे दिल में ना, अब कोई ख्वाहिश,

तमन्ना ऐ दिल मेरी, गम ऐ दरिया में बह गई।।

बेजां पड़ा हु कोने में, ये कैसा मैं जिन्दा हु। 

सैर गगन की चाह बहुत…………………….। 

बेरहम वक़्त था के रेत सा वो फिसलता गया,

राहें थी कठीन हर मोड़ पर जख्म मिलता गया। 

जख्म भरता कैसे, तक़दीर में मलहम ना था,

जख्म उठाते उठाते मैं और दर्द  सिलता गया।।

कहानी बन गया मैं, सब के लिए निन्दा हु।

सैर गगन की चाह बहु……………………..।  

  


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