मैं पेश ऐ दलील करता रहा, उसे यकीं ना आया। 

मेरी एक ना सुनी, मैंने उसे बहुत था समझाया।।

मैं पेश ऐ दलील करता रहा……………………..।

लाख कहने पर भी ना माना, बेकार रहा समझाना। 

हर बार खून का घुट पिया, उसे लगा वो भी बहाना।।

मेरे आंसू ना थमे, मगर उसे ना कभी मैंने रुलाया। 

मैं पेश ऐ दलील करता रहा………………………..।

उसे ख्याल ही ना आया कभी, मेरे अश्क पोछ देने का। 

वो खुद में खोया रहा, सोचा ना मेरा हाल पूछ लेने का।।

सोच के उसकी इन बातों को, कोई सुकूं ना मुझे भाया।

मैं पेश ऐ दलील करता रहा……………………………।

जो उम्मीद थी ना कभी, मुझे उसने वो कह दिया है। 

मेहरबानी उन लब्जो की, जो चैन मेरा छीन लिया है। 

जिसके लिए जीये मरे, उसी ने आज मुझे तड़पाया। 

मैं पेश ऐ दलील करता रहा…………………………..।

  


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