वाह रे औरत तेरा जबाब नहीं। 

क्या कहुँ तेरी तारीफ़ में अल्फाज नहीं। 

जब तूने जन्म लिया,खुशियाँ बेसुमार हुई,

चहकने लगा घर आँगन, जब नन्हें कदमों पे सवार हुई। 

खुशियों की कमी ना थी माँ को,

जब तू माँ का हाथ बटाने को तैयार हुई। 

तुझसा कोई और लाजवाब नहीं। 

क्या कहुँ तेरी तारीफ़ में अल्फाज नहीं। 

 

समझने लगी ऊंच नीच, भाई की गलतियां छुपाने लगी,

पापा की डाट से उसे बचाने लगी। 

माँ को झूठ बोल बोल के,

भाई की जेब खर्ची वो बढ़ाने लगी। 

भाई के लिए उसे कोई सवाल नहीं। 

क्या कहुँ तेरी तारीफ़ में अल्फाज नहीं। 

 

चली वो विदा होके सबको रुला गई,

बदल लिया घर अपना फर्ज निभा गई। 

कोई गीला ना सिकवा किया,

अनजानी जिंदगी भी उसे राश आ गई। 

जबकि उसके सपनो का कोई आगाज़ नहीं। 

क्या कहुँ तेरी तारीफ़ में अल्फाज नहीं। 

 

त्याग की मूरत है,

तेरी हर अदा खूबसूरत है। 

कभी कुछ ना माँगा रब्ब से,

क्या नहीं तेरी कोई जरूरत है। 

क्यू भूख प्यास तक याद नहीं। 

क्या कहुँ तेरी तारीफ़ में अल्फाज नहीं। 

 

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