ज़िंदगी एक सर्कस, ये खेल तमाशे करती है। 

कभी निर्भय हो जाये, कभी ये बहुत डरती है।।

ज़िंदगी एक सर्कस………………….

 

सिर्फ मेरा नहीं ये सारे ज़माने का हाल है। 

जीये तो कैसे हर किसी का ये सवाल है। 

ये ख्यालो की दीवानी नदी सी बहती है। 

ज़िंदगी एक सर्कस………………….

 

अपनी मर्ज़ी से चले कोई रुख ना बदल पाया। 

कभी रुलाया बहुत कभी ज़िंदगी ने हंसाया। 

कभी सहने को मजबूर करे कभी खुद सहती है। 

ज़िंदगी एक सर्कस………………….

 

ज़िंदगी के संग चले तो मंजिल मिल जाती है। 

जो थी कभी दूर बहुत वो पास नजर आती है। 

बहुत मज़ा जब मंजिल पा के ये सम्भलती है। 

ज़िंदगी एक सर्कस………………….

 

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